'रवीन्द्रनाथ ने इस भारतवर्ष को 'महामानव समुद्र' कहा है। विचित्र देश है यह! असुर आए, आर्य आए, शक आए, हूण आए, नाग आए, यक्ष आए, गन्धर्व आए न जाने कितनी मानव जातियाँ यहाँ आई और आज के भारतवर्ष के बनाने में अपना हाथ लगा गईं। जिसे हम हिन्दू रीति-नीति कहते हैं, वह अनेक आर्य और आर्येतर उपादानों का अद्भुत मिश्रण है।
एक-एक पशु, एक-एक पक्षी न जाने कितनी स्मृतियों का भार लेकर हमारे सामने उपस्थित है। अशोक की भी अपनी स्मृति परम्परा है। आम की भी है, बकुल की है, चम्पे की भी है। सब क्या हमें मालूम है? जितना मालूम है, उसी का अर्थ क्या स्पष्ट हो सका है? न जाने किस बुरे मुहूर्त में मनोजन्मा देवता ने शिव पर बाण फेंका था? शरीर जलकर राख हो गया और 'वामन पुराण' (षष्ठ अध्याय) की गवाही पर हमें मालूम है। कि उनका रत्नमय धनुष टूटकर खण्ड-खण्ड हो धरती पर गिर गया। जहाँ मूठ थी, वह स्थान रुक्ममणि से बना था, वह टूटकर धरती पर गिरा और चम्पे का फूल बन गया! हीरे का बना हुआ जो नाह-स्थान था, वह टूटकर गिरा और मौलसिरी के मनोहर पुष्पों में बदल गया! अच्छा ही हुआ।
इन्द्रनील मणियों का बना हुआ कोटि देश भी टूट गया और सुन्दर पाटल पुष्पों में परिवर्तित हो गया। यह भी बुरा नहीं हुआ, लेकिन सबसे सुन्दर बात यह हुई कि चन्द्रकान्त मणियों का बना हुआ मध्य देश टूटकर चमेली बन गया और विद्रुम की बनी निम्नतर कोटि बेला बन गई, स्वर्ग को जीतने वाला कठोर धनुष, जो धरती पर गिरा, तो कोमल फूलों में बदल गया! स्वर्गीय वस्तुएं धरती से मिले बिना मनोहर नहीं होतीं!'
'महामानव समुद्र' से क्या आशय है?
Important Questions on अपठित गद्यांश एवं काव्यांश

